न्यायालयों की भूमिका
सनातन संरक्षण में न्यायालयों की भूमिका
“भारत में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में धमम के आधार पर भेदभावपूर्म कानूनों की सूची”
पूजा स्थल ववशेष प्रावधान अधिनियम 1991
इस अधिनियम (Place of Worship Act, 1991) के अंतर्गत 15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रावधान है।इस कानून के आधार पर अतिक्रमणकारियों के द्वारा तोड़े हुए हिंदू मंदिरों को पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता। यह कानून हमारी संस्कृति को पुनर्जीवित करने में एक बाधा स्वरूप है।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992
यह कानून भेदभावपूर्ण है क्योंकि:
i. इसमें “अल्पसंख्यक” की परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे जिन राज्यों में मुस्लिम समुदाय बहुमत में है, वहाँ भी उन्हें अल्पसंख्यक होने के लाभ मिलते हैं।
ii. इसमें कोई आर्थिक आधार का प्रावधान नहीं है। एक धनवान अल्पसंख्यक (मुस्लिम) को लाभ मिलता है, जबकि एक निर्धन बहुसंख्यक (हिंदू) को वंचित रखा जाता है।
iii. जैन, बौद्ध, सिख आदि भारत में उत्पन्न हुए धर्मों को “अल्पसंख्यक” परिभाषित करके उन्हें अलग पहचान देने का प्रयास किया गया है। यह हिंदू समुदाय में विभाजन की चेष्टा है।
ववदेशी अंशदान ववननयमन अधधननयम 2010 (FCRA Act, 2010)
यह कानून भारत में व्यक्तियों, संगठनों एवं कंपनियों द्वारा विदेशी निधि की स्वीकृति एवं उपयोग को विनियमित करता है।
दुर्भाग्य से, यह पैसा अधिकतर इस्लामिक तथा ईसाई संस्थाओं को विदेशों से धन लाना सुगम बनाता है। इस धन का उपयोग ये संस्थाएँ धर्म परिवर्तन में करती हैं, जिस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
आजकल यह धन न्यायालयों में आतंकवादियों को कानूनी सहायता करने में भी आता है।
बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 (Right to Education Act, 2009)
यह अधिनियम 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा “निःशुल्क एवं अनिवार्य” करता है।
परंतु देश के लगभग 40,000 मदरसों को इस अधिनियम से बाहर रखा गया है। इससे मदरसों को मनमानी ढंग से चलाने की खुली छूट मिल जाती है।
बाल शिक्षा अधिनियम से बाहर होने पर भी इन मदरसों को केंद्र एवं राज्य सरकारों से अनुदान मिलता है।
हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम (Hindu Religious and Charitable Endowments Acts)
यह अधिनियम भारत में राज्य स्तरीय कानून है, जैसे कि तमिलनाडु अधिनियम, 1959 या कर्नाटक अधिनियम, 1997, जिसका उद्देश्य हिंदू मंदिरों, मठों एवं उनकी संपत्तियों का प्रशासन द्वारा विनियमित रूप से प्रबंधन एवं संरक्षण करना है।
इस कानून से हिंदू समुदाय को अति हानि हुई है क्योंकि इससे मंदिरों में आया दान का पैसा सरकार ले लेती है तथा अधिकतर मंदिरों की उपेक्षा हो रही है। साथ ही मंदिरों में अनियमितता तथा अपवित्रता हो रही है।
केवल तमिलनाडु राज्य में ही आज लगभग 1,199 मंदिर जर्जर हालत में पड़े हैं।
हिंदू तथा मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों में अंतर
भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, शरिया आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत एक मुस्लिम पुरुष को एक साथ अधिकतम चार पत्नियों को रखने की अनुमति है, जबकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के व्यक्तिगत कानून में हिंदुओं को एक समय में केवल एक ही पत्नी रखने की अनुमति देता है।
यह भारत में जनसंख्या विस्फोट का मुख्य कारण है। मुसलमानों की जनसंख्या में 1950 के बाद से लगभग 48% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में लगभग 9% की कमी आने का यह एक मुख्य कारण है।
वक्फ अधिनियम, 1995
वक्फ अधिनियम, 1995 भारत में वक्फ संपत्तियों एवं इस्लामिक धार्मिक स्थलों का प्रबंधन तथा नियंत्रण करता है।
इसकी अनियंत्रित शक्तियों के कारण आज भारत में वक्फ बोर्ड लगभग 38 लाख एकड़ से अधिक भूमि में फैली 8.72 लाख पंजीकृत संपत्तियों को नियंत्रित करता है।
देश में भारतीय सेना तथा रेलवे के बाद वक्फ बोर्ड भूमि अधिग्रहण करने वाली तीसरे नंबर पर सबसे बड़ी संस्था है। गैर-सरकारी संस्थानों में यह देश में सबसे बड़ी भूमि अधिग्रहण करने वाली संस्था है।
इसके विपरीत भारत में केवल तमिलनाडु राज्य में ही लगभग 40,000 मंदिर राज्य सरकार के अधीन हैं। इसके अतिरिक्त केवल चार राज्यों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु तथा उड़ीसा) में राज्य सरकारों ने मंदिरों की लगभग 10 लाख एकड़ भूमि अपने नियंत्रण में रखी है।
यह कानून का हिंदुओं के प्रति बहुत बड़ा भेदभावपूर्ण व्यवहार है।
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A
इस अधिनियम में एक विशेष प्रावधान है जिसके अंतर्गत असम में बांग्लादेश से आए उन प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है जो 1971 तक भारत में घुसपैठ कर चुके थे।
इस अधिनियम के कारण असम में मुस्लिम आबादी 1951 में 12% से बढ़कर 2024-25 तक 40% से अधिक हो गई।
अनुमान है कि 2041 तक यह 50% तक पहुँच जाएगी। इससे स्थानीय हिंदू जनसंख्या में आक्रोश तथा भय का वातावरण बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पक्षपाती निर्णय
ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से राज्य वक्फ बोर्डों को इमामों के लिए उचित वेतन देने का आदेश दिया गया।
यह आदेश दिसंबर 1993 से लागू हुआ। पर ऐसा कोई भी आदेश हिंदुओं के मंदिरों के पुजारी आदि के लिए नहीं दिया गया।
इस प्रकार देश में कर (टैक्स) के सार्वजनिक धन का उपयोग एक धर्म विशेष पर किया गया, जो कि संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है।
ऐसे और कई पक्षपाती निर्णयों के कारण आज भारत में लगभग 3 लाख से अधिक मस्जिदें बनाने की प्रेरणा मिली।
धर्मांतरण विरोधी कानून का न होना
भारत में संघीय स्तर पर कोई भी धर्मांतरण विरोधी कानून नहीं है।
कुछ राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, परंतु यह बड़े ही लचीले हैं।
इसके कारण देश में धर्मांतरण पर लगभग खुली छूट है। मुस्लिम तथा ईसाई समुदाय को विदेश से आ रहा पैसा भारत में धर्मांतरण का एक मुख्य प्रलोभन है।
यह भारत में जनसंख्या के असंतुलन का एक मुख्य कारण है।
अप्रवासी विरोधी कानून न होना
2025 तक भारत में कोई प्रत्यक्ष प्रवासी विरोधी कानून नहीं था। पिछले साल ही भारत ने एक कड़ा अप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025 लागू किया है।
ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि भारत में लगभग 5 करोड़ अप्रवासी रहते हैं, जिसमें अधिकतम बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान आदि देशों से आए हैं।
यह भी देश में धर्म आधारित जनसंख्या असंतुलन का मुख्य कारण है।
25% निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत 25% मुफ्त शिक्षा कोटा ईसाई तथा अन्य अल्पसंख्यक संचालित निजी स्कूलों पर लागू नहीं होता।
इससे सामान्य निजी स्कूलों में फीस बढ़ानी पड़ती है तथा बच्चे ईसाई स्कूलों में जाने के लिए प्रेरित होते हैं।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954
इस अधिनियम के तहत अंतरधार्मिक विवाह की खुली छूट है।
इस छूट का दुरुपयोग, मुस्लिम समुदाय संगठित रूप में “लव जिहाद” के रूप में कर रहे हैं, जब वे हिंदू लड़कियों से धोखा देकर विवाह कर उनका धर्म परिवर्तित करते हैं।
इस अधिनियम में अंतरधार्मिक विवाह पर शीघ्र कठोर नियम बनाने की आवश्यकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30
यह अनुच्छेद धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है।
इस अनुच्छेद के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षा पढ़ने का पूरा अधिकार रहता है। ऐसे संस्थानों को राज्य सरकार भी सहायता करने के लिए बाध्य रहती है तथा इसे स्वायत्तता प्रदान की जाती है।
इसके विपरीत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28 के अंतर्गत जो शैक्षिक संस्थान राज्य द्वारा स्थापित किए जाते हैं तथा जहाँ अधिकतर बहुसंख्यक समुदाय के बच्चे ही जाते हैं, वहाँ धार्मिक शिक्षा प्रदान करना प्रतिबंधित है।
वहाँ की शिक्षा का धर्मनिरपेक्ष होना अनिवार्य है। इस प्रकार यह अनुच्छेद बहुसंख्यक समुदाय के बच्चों को सनातन धर्म के मूल्यों की शिक्षा देने में एक बहुत बड़ी बाधा है।
ईशनिंदा कानून
भारत में कोई एक समर्पित ईशनिंदा कानून नहीं है, बल्कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों को अपराध घोषित करने के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 295A का प्रावधान है।
यद्यपि यह कानून सभी समुदायों के लिए ईशनिंदा से निपटने के लिए उपलब्ध है, परंतु व्यावहारिक रूप में न्यायालय इस कानून को बहुसंख्यक समाज के लिए प्रभावशीलता से लागू नहीं करता।
देश के हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को सुरक्षा प्रदान करने में यह कानून असमर्थ रहा।
उत्तराधिकार कानून में असमानता
भारत में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 हिंदुओं की उत्तराधिकार की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय में उत्तराधिकार की प्रक्रिया मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरिया कानून) के आधार पर होती है।
यह असमानता तथा इस प्रकार की कई अन्य असमानताएँ देश में हिंदू और मुस्लिम समुदाय में एकता तथा समरसता लाने में बहुत बड़ी बाधा है।
इसलिए देश में समान नागरिक संहिता का होना देश की एकता के लिए अति आवश्यक है।
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की असमानताएँ
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में अनेक असमानताएँ हैं, विशेष रूप से मुस्लिम स्त्रियों को मुस्लिम पुरुष की तुलना में अनेक अधिकारों से वंचित रखा गया है या असमान रखा गया है।
यह देश के संविधान की मूल भावना, जिसमें सभी को समान अधिकार दिए गए हैं, के विरुद्ध है तथा हिंदू समुदाय के प्रति दुर्भावना तथा पृथकता का भाव सदा बनाए रखता है।
इसका प्रभाव भी देश में एकता और समरसता पर पड़ता है।
भारतीय संविधान में यह विरोधाभास पूर्णतः तर्कहीन है। इसलिए कानूनी तौर पर “मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों” को निरस्त करना देश की सामाजिक समरसता के लिए अति आवश्यक है।
संविधान का अनुच्छेद 25
मूलतः यह अनुच्छेद सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अधीन रहते हुए किसी भी धर्म को मानने और पालन करने का अधिकार प्रदान करता है।
परंतु परोक्ष रूप से यह अनुच्छेद धर्म परिवर्तन के अधिकार को कानूनी मान्यता देता है क्योंकि इसमें अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने के स्वतंत्र अधिकार की गारंटी दी गई है।
इस अनुच्छेद का लाभ उठाते हुए मुस्लिम तथा ईसाई समुदाय विदेश से धन मंगवाते हैं तथा प्रलोभन के सहारे निर्धन एवं अशिक्षित हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करते हैं।
गैर-हिंदुओं के पक्ष में जनसंख्या संतुलन बनाना इसका मुख्य उद्देश्य है। धर्म परिवर्तन के विरुद्ध एक कठोर नियम का होना इस जनसंख्या असंतुलन को रोकने के लिए अनिवार्य है।
"धर्मनिरपेक्ष संविधान" हिंदू विरोधी सिद्धांत
“धर्मनिरपेक्ष” शब्द को भारत के संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन के माध्यम से 1976 में जोड़ा गया।
पर इसका उपयोग मात्र हिंदुओं को अपने धर्म से दूर रखने के लिए किया गया, जबकि मुस्लिम समुदाय को अपने धर्म को सुदृढ़ करने के लिए व्यक्तिगत कानून तथा अल्पसंख्यक अधिनियम के अंतर्गत छूट दी गई।
भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षता के कुछ मुख्य उदाहरण इस प्रकार हैं:
i. हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है, जबकि अल्पसंख्यकों को अपने मस्जिद, चर्च आदि को नियंत्रित करने में स्वायत्तता प्रदान है।
ii. इमामों को सरकारी कोष से वेतन देना।
iii. सनातन के प्रचार को “सांप्रदायिक” तथा “राष्ट्र-विरोधी” परिभाषित करना।
ऐसे उदाहरणों की सूची असीमित है।
प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958
इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग वर्तमान में भारत में कुल 3,690 से अधिक केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों का प्रबंधन करता है।
इनमें से लगभग 1,076 मंदिर हैं, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
एक मंदिर कभी भी स्मारक नहीं हो सकता है। हर मंदिर एक जीवंत स्थान है जहाँ सदा भगवान का वास रहता है।
इसे स्मारक बनाकर रखना हिंदू धर्म की अवमानना है। भारतीय पुरातत्व विभाग, हिंदू धर्म का यह अपमान निरंतर कर रहा है। धर्मनिरपेक्ष सरकारें यह देख रही हैं तथा हिंदू समुदाय असहाय खड़ा है।
उच्च न्यायालय का हिंदू विरोधी पक्ष — कुछ उदाहरण सहित
दुनिया को मात्र यह दिखाने के लिए कि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है तथा राजनीतिक दृष्टि से भी स्वीकाय दिखने के लिए, हमारे उच्च न्यायालय ने अनेक बार कुछ ऐसे निर्णय लिए हैं जो स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण थे तथा विशेषकर जहाँ हिंदू समुदाय के पक्ष को अनदेखा किया गया।
उच्च न्यायालय में अक्सर हिंदू समुदाय की भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता की कमी होती है। उदाहरणतः:
i. हिंदू समुदाय को अपने मंदिरों को नियंत्रित करने के अधिकार के प्रस्ताव को सर्वोच्च न्यायालय में सदा अनदेखा किया गया।
ii. जबकि 1984 में सिखों के प्रति हुई हिंसा के मामले में पुनर्विचार की स्वीकृति उच्च न्यायालय ने दे दी, परंतु 1990 में कश्मीरी हिंदुओं के प्रति हुई हिंसा के मामले को अनदेखा कर दिया गया।
iii. केरल राज्य के एक मंदिर “सबरीमाला” में स्त्रियों के जाने के प्रबंध को संविधान की अवमानना तथा गैर-कानूनी ठहराया गया, जबकि अन्य समुदायों के सार्वजनिक पूजा स्थल पर प्रतिबंध को ठीक ठहराया गया।
iv. न्यायालय ने 1995 में यह निर्णय दिया कि हिंदू धर्म “एक धर्म नहीं बल्कि जीवन शैली या एक मानसिकता है।” ऐसी परिभाषा हिंदू धर्म को कमजोर करने की मानसिकता का शुद्ध प्रमाण है।
v. अल्पसंख्यक आयोग तथा व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में मुस्लिम धर्म को सुरक्षा प्रदान करना तथा हिंदू धर्म को निरंतर धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर तौलकर कमजोर करना भी उच्च न्यायालय के भेदभावपूर्ण व्यवहार का प्रमाण है।
vi. हाल ही में जनवरी 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश का अधिकार है और कहा कि नागरिकता के आधार पर शिक्षा में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
हालाँकि इससे पहले इसी सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र तथा राज्य सरकारों को अवैध अप्रवासियों को निर्वासित करने के “पूर्ण तथा असीमित” अधिकार होने की बात की तथा निर्वासन की कार्रवाई की अनुमति दी।
हिंदू विरोधी कानूनों तथा न्यायालयों की मानसिकता के ये कुछ सांकेतिक उदाहरण हैं। वास्तविकता में यह सूची असीमित है।
