चुनौती:- धार्मिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता

सनातन संरक्षण समिति की मुख्य चुनौतियां

2.

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना अथवा हिंदू समाज को धार्मिक तथा सामाजिक परतंत्रता से मुक्ति दिलाना-

सन 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली थी। पर हिंदू समाज के लिए यह मात्र एक राजनीतिक स्वतंत्रता थी। धार्मिक तथा सामाजिक रूप से हिंदू समाज आज भी परतंत्र है क्योंकि हिंदुओं के सभी प्रमुख मंदिर एवं मठ सरकारों के अधीन है। जब हमारे भगवान परतंत्र हैं तो हम स्वतंत्र कैसे हो सकते हैं? यदि इस्लाम धर्म की मस्जिद तथा ईसाई धर्म के चर्च पूरी तरह से स्वतंत्र है तो केवल हिंदुओं के मंदिर तथा भगवान ही क्यों परतंत्र रहें?
हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण करके सरकार संविधान का स्पष्ट उल्लंघन तथा हिंदू समाज को अत्याधिक क्षति पहुंचा रही है, जो इस प्रकार है-
1. संविधान का उल्लंघन:-
हिंदू मंदिरों का सरकारी नियंत्रण संविधान के अनेक सिद्धांतों तथा अनुच्छेदों का स्पष्ट तथा खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है। उदाहरणत: –
i. अनुच्छेद 25 तथा 26 के अनुसार स्वतंत्र भारत में सभी को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। परंतु मंदिरों तथा धार्मिक स्थलों का नियंत्रण करके सरकार इन दोनों अनुच्छेदों के उल्लंघन तथा बहुसंख्यक हिंदू समाज के साथ निरंतर अन्याय तथा अत्याचार कर रही है।
ii. अनुच्छेद 14 भारत के सभी लोगों को कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समान संरक्षण का अधिकार देता है। परंतु देश में धार्मिक संस्थाओं के संदर्भ में जब कि मुस्लिम एवं ईसाई समुदाय के लोग अपने धार्मिक संस्थाओं का प्रबंध तथा संचालन स्वयं करते हैं, हिंदू समुदाय के मंदिरों का नियंत्रण सरकार के अधीन है। यह असमानता अनुच्छेद 14 के उल्लंघन एवं हिंदुओं के साथ भेदभावपूर्ण नीति का प्रमाण है।
iii. धर्मनिरपेक्षता संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से अंकित है तथा संविधान की बुनियादी संरचना का गैर समझौता योग्य हिस्सा है। इसका मूल भाव सभी धर्मों में समानता तथा किसी भी धर्म में अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप निषेध है। परंतु सरकार संविधान के इस मूल सिद्धांत का उल्लंघन कर निरंतर हिंदू समुदाय के धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप कर रही है।
iv. भारतीय कानून में एक “हिंदू मूर्ति” को कानूनी इकाई के रूप में मान्यता प्राप्त है जो कानूनी अधिकार रखती है। न्यायालयों को एक मान्यता प्राप्त मूर्ति को कानूनी संरक्षण देने का दायित्व होता है। ऐसा कानूनी अधिकार होने के पश्चात भी इस “मूर्ति रूपी देवता” का शोषण सरकारें निरंतर कर रही हैं जो की इस मूर्ति तथा हिंदू धर्म के साथ एक प्रत्यक्ष अन्याय है।
v. हिंदू शास्त्रों के अनुसार मंदिर में आया दान का पैसा तथा संपत्ति देवता की होती है तथा इसका संरक्षण पुजारी का दायित्व होता है परंतु हिंदू मंदिरों का नियंत्रण करके सरकार हिंदू शास्त्रों तथा मंदिरों में स्थापित मूर्ति रूपी देवता का अपमान कर रही है।
2. हिंदू समाज की क्षति:-
i. हर वर्ष हमारे मंदिरों में लगभग 3.5 करोड रुपए की संपत्ति जो कि दान के रूप में आती है आज राज्य सरकारें ले जाती है तथा हिंदू समाज इस पूंजी से वंचित रह जाता है।
ii. धन के अभाव में हिंदू एक सदृढ़ संगठन नहीं बना पा रहे हैं, जो आज उनके हितों की रक्षा कर सके तथा एक संगठन के अभाव में आज हिंदू समाज असहाय, निर्बल, उदासीन तथा अनाथ हो गया है।
iii. कारणवश हिंदू समाज में एकता की कमी पाई जाती है तथा अपने हिंदू धर्म में गर्व महसूस करने में संकोच करता है।
iv. सरकारों द्वारा अपेक्षित, आज देश में हजारों मंदिर जर्जर दशा में हैं।
v. सरकारों द्वारा शोषण तथा धन की अभावता के कारण ही हमारे मंदिर पर्याप्त संख्या में गुरुकुल नहीं खोल पा रहे हैं। आज हमारी सनातन संस्कृति के दिन प्रतिदिन लुप्त होने का यह एक मुख्य कारण है।
vi. विधर्मियों द्वारा नियंत्रण के कारण आज मंदिरों में अपवित्रता तथा ईशनिंदा की घटनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।
यह एक आश्चर्य तथा दुर्भाग्य का विषय है कि उपनिवेशवादियों द्वारा सन् 1817 में प्रारंभ किया गया हिंदू मंदिरों का नियंत्रण वर्तमान में भी चल रहा है जबकि भारत को स्वतंत्र एवं एक जनतांत्रिक गणराज्य घोषित किये हुए लगभग 78 वर्ष हो गए हैं ।
संक्षेप में हिंदू समुदाय की समस्याओं का मुख्य कारण सरकारों द्वारा उनके मंदिरों को नियंत्रित करके मंदिरों तथा हिंदू समुदाय का हर प्रकार से शोषण करना है।
आज मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करवाना हिंदू समाज के लिए एक विशाल चुनौती है।